गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

जब मैं दूसरी कक्षा में चला गया तब मेरा स्कूल जाने का कुछ अभ्यास बढ़ा । स्कूल के प्रति भय भी कम हुआ । दूसरी कक्षा में कुछ दिनों तक कुरेशिया पंडीतजी ने हमें पढ़ाया था। वे लंबे पतले और खूब पान खाने वाले थे। उनका लड़का सतीश भी मेरी कक्षा में था। स्कूल नाके से लगी हुई थी। जब भी कोई बस गुजरती मैं पंडीतजी से पूछ पड़ता - क्या टाईम हुआ है ? मेरे लगातार इस तरह से पूछने पर कुरेशिया पंडितजी एक दिन खीज गये। उन्होंने डपटते हुए पूछा बार बार टाईम क्यों पूछते हो ? मैंने उत्तर दिया क्योंकि इससे मुझे बसों का आने जाने का टाईम पता चल जाता है। उन दिनों बस ट्रक मोटर साईकल बहुत कम थी। वे हमारे लिए बहुत आकर्षण का विषय थी । मैं जब चौबीस दिन और दो महिने की छुट्टी में गांव जाता था अपने दोस्तों मोहन पंडित, रुपसिंह और अनूपसिंह, टीटू, सतनारान और बिननारान को मोटर के किस्से सुनाता था। यह भी बताता था कि गजानंद मोटर कितने बजे आती है और चावला मोटर कब जाती है। बालाजी की मोटर कैसी खटारा है आदि आदि वे सब बड़े कौतूहल से यह सब समझते और जानते। उन दिनों हमारे गांव में बिल्कुल कच्ची धूल भरी सड़कें थी। जिनपर से यदि कभी कभार महीने दो महीने में कोई फटफटी गुजर जाये तो पूरे गांव के बच्चे हो हो करते उसके पीछे पीछे दौड़ लगाते और गांव के बाहर तक छोड़कर आते थे। दूसरी कक्षा में कोई भी नया पाठ शुरु करना होता तो पंडितजी मुझसे ही पढ़वाते थे क्योंकि मैं साफ और सही सही उच्चारण से पढ़ लेता था। बाकि बच्चे ऐसा पांचवी तक भी नहीं कर पाते थे। दरअसल मेरी पढ़ने की यह आदत इसलिए भी बन गयी थी क्योंकि मैं दुकानों, बसों या दीवारों पर जो भी लिखा होता उसको, अक्षर जोड़ जोड़कर पढ़ने की कोशिश करता रहता था। मैं कहीं भी जाता दुकानों के बार्ड और दीवारों पर लिखे विज्ञापन पढ्ता जाता-हम दो हमारे दो----- डाबर जनम घुटटी ----- चेचक या बडी माता बताये और ईनाम पाये -------- अ स खिडबडकर---एम एल राय बी ए विशारद --- गोपाल मे‍डिकल ---आदि आदि । घर में पिताजी धर्मयुग और सारिका लाते थे। धर्मयुग का कार्टूंन वाला आखिरी पन्ना मैं सबसे पहले पढ़ता था। बाकि के नहीं। स्कूल में जब प्रार्थना होती तो मुझे आगे खड़ा किया जाने लगा। मैं पहले एक पंक्ति गाता फिर दूसरे लड़के दोहराते।
उस समय शिक्षक हाजिरी लेते और बाप का नाम तथा जाति अवश्‍य पुकारी जाती। अपने सहपाठियों की जातियों का बोध और जानकारी जाने अनजाने सबके मस्तिष्क में आती जाती थी। शायद तब समाज ही ऐसा था कि जातियां एक क्रूर यथार्थ की तरह सामने आती थी। शिक्षकों के मन में जातियों की शायद समझ थी। जब बड़े पंडीजी के पांव दुखते तो वे राजा से कहते जरा दबा तो बेटा! यदि प्रार्थना में कोई लड़का उल्टी कर देता तो सफाई कामगारों के लड़के आपस में बुदबुदाने लगते- मेकू बोला तो में तो मना बोल दूंगा! ऐसी स्थिति आने पर उन बेचारों को ही यह काम करना पड़ता था । पर मुझे आज की तरह उन दिनों जातिगत घृणा और वैमनस्य का कभी अहसास नहीं हुआ। या यह भी हो सकता है मैं महसूस करने की काबिलियत नहीं रखता था। जो भी हो हम सारे सहपाठी बहुत प्यार से साथ खेलते कूदते। हरणे पंडीतजी जोर जोर से हाजिरी पुकारते वे जाति का उच्चारण कुछ ज्यादा ही कठोर और आरोह स्वर में करते थे - धर्मेन्द्र रमेशचद्र -ब्राह्मण, मोहन ताराचंद -कहार , विष्णु भागीरथ- ढीमर, रामचंदर रामू- कहार, सतीष गंगाराम -......, राजेश पूनचंद -सुनार, रामकिशन श्रीकिशन- ......, मधुकर श्रीकिशन- ......, राकेश हरनारायण - गूजर, सुनील सालकराम- काछी, सुभाष गुलाब- माली, रामदास गंगाराम -......, राजेन्द्र रामरतन - गुरुवा, अरविंद सीताराम -गाडरी, सुरेन्द्र रामेश्‍वर- ब्राह्मण, राधाकिशन भैयालाल - माली, गोपीकिशन भैयालाल- माली, लखन मुरली - जोशी, रवि मंगू- धोबी, शब्‍बीर अल्लाबेली- लुहार, शेख जान मोहम्मद वल्द शेख न्याज मोहम्मद, रवि दयाराम- गाडरी, राजकुमार लक्ष्मीनारायण- नाई, गफ्फार सत्तार- ......, अकरम खां वहीद खां- पिंजारा, मनोज रामधार- ......, तोताराम गंगाराम- ......, मदन सोमा - ......वर्षो तक लगभग आठ साल में बहरे और गूंगे भी इन नामों को रट समझ लेते । इस तरह सारे बच्चों को पूरी कक्षा के नाम मय वल्दियत और जाति के रट गये थे। जब बच्चों का आपस में झगड़ा होता वे बाप का नाम लेकर लड़ते फलाने वाले ...ठीक रहना बेट्टाऽ...नीं तो टांग तोड़ दूंगा ...! स्कूल में दो बार छुट्टी होती थी एक पिशाप पानी की छुट्टी कहलाती थी दूसरी आधी छुट्टी कहलाती थी । पिशाप पानी की छुट्टी दस मिनट और आधी छुट्टी आधे घंटे की होती थी । इन छुट्टियों में हम खूब छील बिलाई का खेल खेलते । गिरते पड़ते । बहुत सारे बच्चों के घुटने प्रायः फूटे रहते । घुटने पक भी जाते थे । उनसे मवाद भी आता था । पर हम अनवरत खेलते थे । विष्णु तो उन दिनों अपने आप को डॉन कहता था । वह प्रताप टाकिज वाले बाफना जी के घर काम भी करता था । उसी से हमें यह जानकारी मिलती थी कि प्रताप टाकिज में अब किस फिल्म की पेटी आई है । रामकिशन और लखन तो अक्सर फिल्म देख भी आते थे । पर मेरे जैसे ज्यादा थे जिनके भाग्य में यह नहीं बदा होता । हम अपनी बेचारगी पर मायूस होते थे और सिनेमा जा सकने वालों से किस्से सुनते थे। हमारे मोहल्ले से उन दिनों सिनेमा के विज्ञापनों की चके वाली दो गाड़ियां निकलती थी जिसमें पेंटर लोग फिल्मों के नाम पेंट से लिखते थे और साथ में सिनेमा का पोस्टर चिपका देते थे। कभी कभी तांगे और रिक्‍शे पर अनाउंसमेंट भी होता - सिरी परताप टाकिजऽ में इस्टमेन कलर में मारधाड़ हंसी गाने मनोरंजन से भरपूर फिलिम देखना न भूलिये- कहानी किस्मत की । जिसके चमकते हुए सितारे हैं.......आदि आदि हम यह सब बड़े चाव से सुनते और गाड़ियों पर लिखे पोस्टर देखते पढ़ते और चर्चा करते । रामकिशन तो आकर गाने भी सुनाता था !(सतत जारी -----)
धर्मेन्द्र पारे
 

दूसरी कक्षा का  साल और harne